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Chapter 5- पुष्पी पादपों की आकारिकी (Morphology of Flowering Plants) Interview Questions Answers

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Question 1 : मूल के रूपान्तरण से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में किस प्रकार का रूपान्तरण पाया जाता है?
(अ) बरगद
(ब) शलजम
(स) मैंग्रोव वृक्ष।

Answer 1 :

मूल के रूपान्तरण मूल अथवा जड़ का सामान्य कार्य पौधे को स्थिर रखना और जल एवं खनिज पदार्थों का अवशोषण करना है। इसके अतिरिक्त जड़े कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए रूपान्तरित हो जाती हैं।
(अ)
बरगद (Banyan Tree) :
इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर मिट्टी में धंस जाती हैं। इन्हें स्तम्भ मूल (prop roots) कहते हैं। ये शाखाओं को सहारा प्रदान करने के अतिरिक्त जल
एवं खनिजों का अवशोषण भी करती हैं। ये अपस्थानिक होती हैं।
(ब)
शलजम (Turnip) :
इसकी मूसला जड़ भोजन संचय के कारण फूलकर कुम्भ रूपी हो जाती है। इसे कुम्भीरूप जड़ (napiform root) कहते हैं।
(स)
मैंग्रोव वृक्ष (Mangrove Tree) :
ये पौधे लवणोभिद् होते हैं। इनकी कुछ जड़ों के अन्तिम छोर बूंटी की तरह मिट्टी से बाहर निकल आते हैं। इन पर श्वास रन्ध्र पाए जाते हैं। ये जड़े श्वसन में सहायक होती हैं। अतः इन्हें श्वसन मूल कहते हैं; जैसे-राइजोफोरा

Question 2 :
बाह्य लक्षणों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की पुष्टि करें
(i) “पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते हैं।”
(ii) फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है।

Answer 2 :

(i) पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए
आलू, अरबी आदि। ये तने के रूपान्तरण हैं। ये भूमिगत तना हैं। इन्हें कन्द कहते हैं तथा ये भोजन संचयन का कार्य करते है। ये तना हैं इसकी पुष्टि अग्रवत् की जा सकती है
1. इन पर आँख (eye) मिलती है जो वस्तुत: कक्षस्थ कलिका की सुरक्षा करती है।
2. यदि इसे अंकुरण के लिए रखा जाए तो इस कक्षस्थ कलिका से शाखा निकलती है।
3. जड़ में कोई पर्व अथवा पर्व सन्धि नहीं होती है; अत: किसी प्रकार का अंकुरण होने के लिए। कक्षस्थ कलिका भी नहीं होती है।
(ii) फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है (Flower is a modified shoot) :
पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (modified shoot) है। पुष्प का पुष्पासन अत्यन्त संघनित अक्षीय तना है। इसमें पर्वसन्धियाँ अत्यधिक पास-पास होती हैं। पर्व स्पष्ट नहीं होते। झुमकलता (Passiflord suberosa) में बाह्यदले तथा दल पुष्पासन के समीप लगे होते हैं, लेकिन पुंकेसर वे अण्डप कुछ ऊपर एक सीधी अक्ष पर होते हैं। इसे पुमंगधर (androphore) कहते हैं। हुरहुर (Gynandropsis) में पुष्प दलपुंज व पुमंग के मध्य पुमंगधर तथा पुमंग एवं जायांग के मध्य जायांगधर (gynophore) पर्व स्पष्ट होता है। कभी-कभी गुलाब के पुष्पासन की वृद्धि नहीं रुकती और पुष्प के ऊपर पत्तियों सहित अक्ष दिखाई देती है।
दल, पुंकेसर, अण्डप, पत्तियों के रूपान्तरण हैं। मुसेन्डा (Mussgenda) में एक बाह्यदल पत्ती सदृश रचना बनाता है। गुलाब में बाह्यदल कभी-कभी पत्ती सदृश रचना प्रदर्शित करते हैं। लिली (निम्फिया) बाह्यदल एवं दल के मध्य की पत्ती जैसी रचना है। गुलाब, कमल, केना आदि में अनेक पुंकेसर दलों में बदले दिखाई देते हैं। आदिपादपों के पुंकेसर पत्ती समान थे; जैसे-ऑस्ट्रोबेलिया (Austrobaileya) में प्रदर्शित होता है।

Question 3 : एक पिच्छाकार संयुक्त पत्ती हस्ताकार संयुक्त पत्ती से किस प्रकार भिन्न है?

Answer 3 : पिच्छाकार संयुक्त तथा हस्ताकार संयुक्त पत्ती में अन्तर

Question 4 : विभिन्न प्रकार के पर्णविन्यास का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

Answer 4 : पर्णविन्यास तने या शाखा की पर्वसन्धियों पर पत्तियाँ एक विशिष्ट क्रम में लगी होती हैं। इसे पर्णविन्यास कहते हैं। पर्वसन्धि पर पत्तियों की संख्या एक, दो अथवा दो से अधिक होती है। पर्ण विन्यास निम्नलिखित प्रकार को होता है

1. एकान्तर (Alternate) :
जब एक पर्वसन्धि पर एक पत्ती होती है तथा अगली और पिछली पर्वसन्धि पर लगी पत्ती से इसकी दिशा विपरीत होती है; जैसे-गुड़हल, सरसों आदि।
2. अभिमुख (Opposite) :
जब एक पर्वसन्धि पर दो पत्तियाँ होती हैं, तब दो प्रकार की स्थिति हो सकती हैं
क) अध्यारोपित (Superposed) :
जब पत्तियों की दिशा प्रत्येक पर्वसन्धि पर एक ही होती है; जैसे—अमरूद।
(ख) क्रॉसित (Decussate) :
जब दो पत्तियों की दिशा प्रत्येक पर्वसन्धि पर पिछली तथा अगली पर्वसन्धि की अपेक्षा समकोण पर होती है; जैसे-आक।
3. चक्रिक (Whorled) :
जब एक पर्वसन्धि पर दो से अधिक पत्तियाँ होती हैं; जैसे—कनेर।

Question 5 :
निम्नलिखित की परिभाषा लिखिए
(अ) पुष्पदल विन्यास
(ब) बीजाण्डन्यास
(स) त्रिज्यासममिति
(द) एकव्याससममिति
(य) ऊर्ध्ववर्ती
(र) परिजायांगी पुष्प
(ल) दललग्न पुंकेसर।

Answer 5 :

(अ) पुष्पदल विन्यास (Aestivation) :
कलिका अवस्था में बाह्यदलों या दलों (sepals or petals) की परस्पर सापेक्ष व्यवस्था को पुष्पदल विन्यास कहते हैं। यह कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी या वैक्जीलरी प्रकार का होता है।
(ब) बीजाण्डन्यास (Placentation) :
अण्डाशय में जरायु (placenta) पर बीजाण्डों की व्यवस्था को बीजाण्डन्यास कहते हैं। बीजाण्डन्यास सीमान्त, स्तम्भीय, भित्तीय, मुक्त स्तम्भीय, आधार-लग्न या धरातलीय प्रकार का होता है।
(स) त्रिज्यासममिति (Actinomorphy) :
जब पुष्प को किसी भी मध्य लम्ब अक्ष से काटने पर दो सम अर्द्ध-भागों में विभक्त किया जा सके तो इसे त्रिज्यासममिति (actinomorphy) कहते
(द) एकव्याससममिति (Zygomorphy) :
जब पुष्प केवल एक ही मध्य लम्ब अक्ष से दो सम अर्द्ध-भागों में विभक्त किया जा सके तो इसे एकव्याससममिति कहते हैं।